चुनावी फायदे के लिए साम्प्रदायिक तनाव फैलाने में जुटी भाजपा

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अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल से पता चलता है कि 18 जून 2013 के बाद बिहार में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं में अचानक तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। आखि‍र यह तारीख इतनी खास क्यों है? … क्योंकि इसी दिन बिहार में जद यू और भाजपा का गठबंधन अलग हुआ था। तो साम्प्रदायिक हिंसा क्यों बढ़ी? बिहार के इस निर्णायक चुनाव में इस बात की क्या अहमियत है?

अखबार की पड़ताल बिहार के 24 जिलों और 50 फीसदी क्षेत्र को कवर करता है। इन्हीं इलाकों में 2010 से 2015 के बीच 70 फीसदी साम्प्रदायिक घटनाएं हुई हैं। इन जिलों में मुसलमानों की संख्या एक जैसी नहीं है। इन जिलों में मुसलमान, राज्य की औसत मुस्ल‍िम आबादी 16.5 फीसदी से कहीं ज्यादा, कहीं कम हैं।

पड़ताल से चिंताजनक हालात का पता चलता है। साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं में तीन गुना बढ़ोतरी बता रही है कि किस तरह साम्प्रदायिक सौहार्द्र को सुनियोजित तरीके से बिगाड़ा जा रहा है। तनाव की शुरुआत की वजह आमतौर पर सोची-समझी कार्रवाई लगती है। जैसे- किसी मंदिर में मांस का टुकड़ा फेंक देना या किसी मस्जिद में सूअर का गोश्त। कई और उदाहरण हैं। जैसे, कहीं किसी घाट के किनारे मस्जिद बनाने की अफवाह या कहीं मंदिर बनाने की अफवाह। धार्मिक जुलूसों का भी इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए किया जा रहा। साम्प्रदायिक हिंसा की ज्यादातर घटनाएं उन इलाकों में हुईं, जहां मुसलमान की आबादी, राज्य औसत (16.5 फीसदी) से कम है। जून 2013 और जून 2015 के बीच इन जिलों में ऐसी हिंसक घटनाओं की संख्या 151 से बढ़कर 471 पहुंच गई।

इन बातों को थोड़ा और बेहतर तरीके से समझने के लिए जरा ध्यान दीजिए। जनवरी 2010 से जून 2013 के बीच साढ़े तीन साल के दौरान कम से कम 19 ऐसे जिले थे, जहां साम्प्रदायिक तनाव की कुल तीन घटनाएं हुई थीं। इन्हीं 19 जिलों में जून 2013 से जून 2015 के बीच 10 से ज्यादा साम्प्रदायिक तनाव की घटनाएं हुईं।

हालांकि अभी जांच चल रही है, फिर भी ज्यादातर घटनाओं से साफ रुझान मिल रहा है‍ कि दंगा और हिंसा भड़काने की कोशि‍शें सुनियोजित थीं। उदाहरण के लिए 2015 में जहानाबाद में हुई घटना को ही लीजिए। पुलिस ने दंगाइयों से एक ही आकार-प्रकार की लाठियां जब्त कीं। इससे लगता है कि ये सभी लाठियां एक ही जगह से आई थीं। यही नहीं इस खास मामले में विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के एक बड़े नेता से पूछताछ भी हुई।

इन सभी जिलों में जहां साम्प्रदायिक हिंसा अचानक तेजी से बढ़ी है, लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहायोगियों को बड़ी कामयाबी मिली थी। इन जिलों की 18 लोकसभा सीटों पर भाजपा और 4 सीटों पर उसके सहयोगी जीते थे।

बिहार विधानसभा का चुनाव अब चंद ही दिन दूर है। ये रुझान राज्य में साम्प्रदायिक सौहार्द्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। यह हम सबके लिए चिंताजनक बात है। वोटरों को साम्प्रदायिक धुव्रीकरण के प्रचार पर नजर रखनी चाहिए। इनसे होशि‍यार रहना चाहिए। भाजपा के उम्मीदवारों के मुंह से एक ओर हम ‘विकास’ की बात सुनते हैं तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है। ध्यान रहे, वोटरों का साम्प्रदायिक आधार पर धुव्रीकरण भाजपा और उसके एनडीए सहयोगियों का चुनावी मंत्र बन चुका है।

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